क्यूँ मजदूरी के दलदल में फंसता है, बचपन

रामपुर

 17-03-2020 12:50 PM
सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

भारत में बाल मजदूरी की ये समस्या आज भी सरेआम दिखाई पड़ती है और ज्यादातर लोग इस समस्या से आंखे मूंद कर बैठे हैं। नीचे दी गई कविता कितने सरल तरीके से इस समस्या पर रोशनी डालती है। आप और हम दिनभर में दफ्तर आते जाते कितने ही ऐसे ‘’छोटू’’ से टकराते हैं, कभी-कभी तो अपने निजी स्वार्थ के चलते इनसे काम भी ले लेते हैं और अनजाने में ही बाल मजदूरी के कुचक्र का हिस्सा भी बन जाते हैं। उम्मीद है कविता की ये पंक्तियां सभी पाठकों की आत्मा को झकझोरेंगी।

पढ़ने की जब उम्र थी उसकी,पढ़ नहीं पाया
मात-पिता निज स्वार्थ ने उसको काम लगाया
रह गया अंगूठा छाप आज करता मजदूरी
नहीं पढ़ाया उसको क्यूँ, थी क्या मजबूरी
नन्ही अंगुली ने बीड़ी के धागे बांधे
भार उठाया उम्र से ज्यादा दुखे काँधे
मंद रोशनी में बुनता था रात गलीचा
सुबह उठा मालिक का सींचा बाग़ बगीचा
रंग रासायनिक से की है उसने वस्त्र छपाई
जूठी प्लेट उठा कर जिसने भूख मिटाई
वर्कशॉप में मार वो, जब औज़ार से खाता
नन्हा दिल बस सुबक सुबकता रो नहीं पाता
सड़क पार करता, ले जा कर चाय केतली
जान बचा ट्रेफिक से लड़ता सड़क हर गली
ढाबे में हम जब भी जाकर खाना खाते
‘छोटू‘ दे आवाज़ उसी से जल मंगवाते
मेज़ पोंछता नन्हे हाथ जब रखते थाली
थोड़ी सी गलती पे, खाता ढेरों गाली

रामपुर में बाल मजदूर चाकू बनाने की फैक्ट्री (Factory) समेत बीड़ी बनाने, ज़री का काम और पैबंद लगाने जैसे काम करते हैं। बहुत से बच्चे तो अपने परिवारजनों के साथ घरों में भी ये काम करते हैं।

बाल श्रम की परिभाषा
अंतर्राष्ट्रीय लेबर ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुसार बाल श्रम की परिभाषा है - वह काम जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनके आत्मसम्मान से वंचित करता है; और उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए हानिकारक होता है, स्कूली शिक्षा से उन्हें दूर करता है, समय से पहले स्कूली शिक्षा छोड़ने पर मजबूर करता है, या जो उन्हें स्कूली शिक्षा के साथ-साथ लंबे और जोखिम भरे कामों का बोझ उठाने के लिए मजबूर करता है। कुछ बाल अधिकार कार्यकर्ताओँ का तर्क है कि बाल श्रम की श्रेणी में हर उस बच्चे को शामिल किया जाए जो स्कूल नहीं जाते क्योंकि ऐसे बच्चे भी छुपे हुए बाल श्रमिक ही हैं। यूनिसेफ (UNICEF) के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों, कक्षाओं और अध्यापकों की भारी कमी है जहाँ 90% बालश्रम की समस्या पैदा होती है। पांच में से एक प्राइमेरी स्कूल (Primary School) में एक अध्यापक सारी कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाता है।

भारत में बाल श्रमिक
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 से 14 वर्ष के बाल श्रमिकों की संख्या 1.01 करोड़ है और इस आयु वर्ग के श्रमिकों की कुल संख्या 25.964 करोड़ बातायी गई है। बाल श्रमिकों की समस्या अकेले भारत की समस्या नहीं है, पूरी दुनिया में 21.7 करोड़ बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर फुल टाइम (Full Time) बाल श्रम करते हैं।

बाल श्रमिकों के प्रकार और बाल मजदूरी के कारण
1. बिना वेतन घरेलू नौकर -
घरों में सफाई, खाना बनाने, कपड़े धोने, छोटे बच्चों की देखभाल, पानी भरने जैसे कई काम बच्चों से ही कराए जाते हैं। गांव में फसल की देखभाल, लकड़ी काटना, पशु चराना, आदि। इन कामों की वजह से बच्चे का विकास और उसकी पढ़ाई-लिखाई दोनों बाधित होती है।
2. वेतन पर बाल श्रम मजदूरी- बाल श्रमिक संगठित और असंगठित दोनों श्रेत्रों में मजदूरी करते हैं।
3. घरेलू कामों के लिए वेतन पर- अपने माता-पिता के साथ बच्चे काम में उनका हाथ बंटाते हैं। स्वतंत्र रूप से लोगों के घरों में काम करते हैं।
4. अपना खुद का काम करना- 15 साल से कम उम्र के बच्चे घर की गरीबी में हाथ बंटाने के लिए पैसा कमाने के धंधे में लग जाते हैं। इस काम में कोई उनका संरक्षक नहीं होता। वेल्डिंग (Welding), जूता पॉलिश (Polish) करना, कूड़ा उठाना और बोझ ढोना आदि।

खेती किसानी के अलावा बच्चे घरेलू कामों में मदद, व्यापार, घरेलू उद्योग, शिल्प जिसमें कपड़ा बुनाई, मूर्तिकला, लोहार का काम, सुनार का काम, कालीन उद्योग, मछलीपालन और अपने घरेलू उद्योग में माता-पिता के साथ उनका हाथ बंटाते हैं। शहरी क्षेत्रों में ईंटा भट्टा फैक्ट्री, बीड़ी, साबुन फैक्ट्री, पत्थर तराशना आदि कामों में बाल श्रमिकों का जमकर इस्तेमाल होता है।

बंधुआ मजदूरी की प्रथा और भारत
बंधुआ बाल मजदूर एक जबरन थोपी गई वो व्यवस्था है जिसमें बच्चा या उसके माता-पिता एक मौखिक या लिखित समझौते के तहत अपना क़र्ज़ उतारने के एवज में उस बच्चे को बंधुआ मजदूर बना देते हैं। भारत में बंधुआ मजदूरों की समस्या औपनिवेशिक समय में शुरू हुई।

भारतीय संविधान और बाल मजदूरी
भारतीय संविधान के अनुसार 14 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी भी फैक्ट्री, खान या किसी जोखिम भरे काम में अनुबंधित नहीं किया जा सकता है। श्रम की न्यूनतम उम्र 14 साल है। 14 साल से कम उम्र में किसी भी संस्थान में बाल श्रम की सख्ती से मनाही है। इस नियम की अनदेखी करने पर जुर्माने के अलावा कुछ राज्यों में जेल भेजने का भी प्रावधान है। बच्चे 6 घंटे से अधिक एक दिन में काम नहीं कर सकते जिसमें 1 घंटे का विश्राम (तीन घंटे काम करने के बाद) शामिल है। रात की पारी में काम (शाम 7 बजे से सुबह 8 बजे तक) और ओवरटाइम (Overtime) बच्चों के लिए प्रतिबंधित है। संविधान के अनुसार ये राज्यों का कर्तव्य है कि 6 से 14 साल तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा का प्रबंध करें। बाल श्रम (प्रतिबंध एवं नियमन) संशोधन अधिनियम 2012 राज्यसभा और लोकसभा से जुलाई 2016 में पास हुआ था। इसके अंतर्गत 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कुछ व्यवसायों में काम करना प्रतिबंधित किया गया जैसे ऑटोमोबाइल वर्कशॉप्स (Automobile Workshops), बीड़ी उद्योग, कालीन उद्योग, हथकरघा उद्योग, खदान और घरेलु कामकाज।

अगर एक बच्चा बाल कलाकार के रूप में ऑडियो-वीडियो (Audio-Video) मनोरंजन उद्योग, विज्ञापन, फिल्म (Film), धारावाहिकों जैसे मनोरंजन या खेल संबंधी गतिविधि में (सर्कस छोड़कर) काम करता है तो कानून के अनुसार इसकी अनुमति इसी शर्त पर दी जा सकेगी कि ऐसे कार्य बच्चे की स्कूली शिक्षा को प्रभावित ना करें। किशोर उम्र (14-18 वर्ष) की एक नई परिभाषा भी इस अधिनियम में दी गई है। किशोरों का खदान, विस्फोटकों, ज्वलनशील और खतरनाक पेशों में काम करना पूरी तरह से प्रतिबंधित किया गया है। इस संशोधन बिल में अभिभावक और संरक्षकों को दण्ड से मुक्त रखा गया है लेकिन अगर दोबारा यह अपराध अभिभावक करते हैं तो 10 हज़ार रुपये का जुर्माना उनपर हो सकता है। कोई नियोक्ता अगर किसी 14 साल से कम उम्र के बच्चे से काम करवाता है तो उसे 6 महीने की कैद, 20 हज़ार से 50 हज़ार रुपये के बीच जुर्माना या दोनों भुगतना पड़ेगा। अगर कोई नियोक्ता किसी किशोर (14-18 वर्ष आयु) को खतरनाक कामों के लिए नियुक्त करता है तो उसे 6 महीने से लेकर 2 साल का कारावास, 20 हज़ार से 50 हज़ार का जुर्माना या दोनों भुगतना पड़ सकता है। संशोधन अधिनियम में बाल और किशोर श्रमिक पुनर्वासन कोष के लिए भी कानून बनाया है। इससे उन बच्चों की मदद की जाती है जिन्हें इस तरह के शोषण से मुक्त कराया गया है। बच्चों की निशुल्क अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुसार शिक्षा की अनिवार्य उम्र 14 वर्ष है।

द फैक्ट्रीज़ एक्ट ऑफ 1948 (The Factories Act of 1948) - इसके अनुसार 14 साल से कम उम्र के बच्चों को एक फैक्ट्री में रोज़गार देना गैरकानूनी है। इस नियम के द्वारा स्पष्ट किया गया है कि 15-18 साल की उम्र के बच्चों को कौन, कब और कितने समय के लिए फैक्ट्री में रोज़गार दे सकता है।
द माइन्स एक्ट ऑफ 1952 (The Mines Act of 1952)- इस एक्ट के मुताबिक 18 साल से कम उम्र के बच्चों को किसी भी खदान में काम करने की सख्त मनाही है।
द जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) ऑफ चिल्डरेन एक्ट 2015 - इस कानून के मुताबिक किसी भी व्यक्ति का रोज़गार की आड़ में किसी बच्चे को बंधुआ मजदूर की तरह रखना एक अपराध है जिसमें जेल की सज़ा का प्रावधान भी होगा।

लिंगभेद और बाल मजदूरी
यूनिसेफ के मुताबिक लड़कों के मुकाबले लड़कियों के स्कूल बीच में छोड़ने की संख्या लगभग दुगनी है। सीमित आर्थिक साधनों वाले अभिभावकों के सामने जब यह परिस्थिति आती है कि वे दोनों में से किसी एक बच्चे की ही स्कूल फीस (School Fees) भर सकते हैं, तो ज्यादातर माता-पिता लड़के की फीस भरते हैं और लड़की की पढ़ाई छुड़वाकर उसे बाल श्रमिक बना देते हैं। भारत समेत पूरी दुनिया में लड़कियों की पढ़ाई लिखाई को सबसे कम प्राथमिकता दी जाती है। युनीसेफ के अनुसार लिंगभेद भी एक अहम कारण है जिससे ज्यादा संख्या में लड़कियां बाल श्रमिक बना दी जाती हैं।

विभिन्न जोखिम भरे उद्योगों में बाल मजदूर
खदानों में - 1952 के कानून के हिसाब से 18 साल से कम उम्र के बच्चे कोयला खदानों में काम नहीं कर सकते। मेघालय में 2013 में 18 साल से कम उम्र के बच्चों की कोयला खदानों में काम करने की खबर ने मीडिया (Media) में खूब सुर्खियां बटोरी थीं।
घरेलू श्रम- सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बाल श्रमिक जो घरेलू कामकाज और रेस्टोरेंट (Restaurant) में काम करते हैं उनकी संख्या 2.5 करोड़ है। भारत सरकार ने चाइल्ड लेबर प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन एक्ट (Child Labour Prohibition & Regulation Act) के दायरे को बढ़ाते हुए रेस्टोरेंट, ढाबे, होटल (Hotel), स्पा (Spa) और रिसोर्ट (Resort) में बच्चों का श्रमिकों की तरह प्रयोग 10 अक्टूबर 2006 से प्रतिबंधित कर दिया है।
कालीन बनाने का उद्योग
आकड़ों के अनुसार भारत में निर्मित 20% कालीन उद्योग में बच्चों का श्रमिक के रूप में इस्तेमाल होता है। ऐसा मानना है कि मुस्लिम समुदाय में बाल श्रम का सबसे अधिक प्रयोग कालीन निर्माण में होता है, खासतौर से मुस्लिम बहुल आबादी वाले गांवों में बंधुआ बाल श्रमिकों की अच्छी खासी संख्या है।
रेशम निर्माण
2003 की ह्यूमन राइट्स वॉच रिपोर्ट (Human Rights Watch Report) बताती है कि पांच साल तक की उम्र के बच्चे काम पर रखे जाते हैं, जिनसे 6 से 7 दिन हर हफ्ते में रोज़ाना 12 घंटे का श्रम कराया जाता है।
आतिशबाजी उत्पादन
दक्षिण भारत के सिवाकासी में आतिशबाजी और माचिस बनाने का काम लघु उद्योग के स्तर पर होता है। इसमें बाल मजदूरों का प्रयोग होता है। 2011 में सिवाकासी में 9,500 से ज्यादा आतिशबाजी निर्माण की फैक्ट्रियां काम करती थी। पटाखों का लगभग 100% उत्पादन सिवाकासी में ही होता था। 1989 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक इस उद्योग में बाल मजदूरों से काम लिया जा रहा है और उनकी सुरक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं है। छोटी, असंगठित फैक्टरियों में काम के ज्यादा घंटे, कम वेतन, असुरक्षित और थका देने वाली दिनचर्या है।
हीरा उद्योग
1999 की अंतर्राष्ट्रीय लेबर ऑर्गनाइज़ेशन रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय हीरा उद्योग में बाल मजदूरों का प्रयोग हो रहा है। दक्षिण गुजरात के हीरा वर्कर्स एसोसिएशन ने बताया कि वे सिर्फ 1% बाल मजदूर इस्तेमाल करते हैं। 2005 के एक शोध के अनुसार जो 21 अलग-अलग जगहों से 663 हीरा मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट (Manufacturing Unit) के सर्वेक्षण पर आधारित था, यह तथ्य सामने निकलकर आया कि इसमें बाल श्रमिकों की संख्या घटकर 0.31% रह गई है।

इसलिए अब अगली बार जब आप किसी ‘छोटू’ को देखें, तो उसे नज़रंदाज़ करने के बजाय उससे कुछ देर बात करें और समझने की कोशिश करें कि आखिर वो क्यों बचपन से काम में लग गया है, और सोचें कि आप किस प्रकार उसकी सहायता कर सकते हैं।

संदर्भ:
1.
https://paycheck.in/labour-law-india/fair-treatment/minors-and-youth
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Child_labour_in_India
3. https://bit.ly/39Swtky
4. https://reut.rs/2Ugm9wl
5. https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/66453/6/06_chapter%201.pdf
चित्र सन्दर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Child_labour
2. https://pixabay.com/it/photos/lavoro-minorile-934893/



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