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क्या हैं पुनर्जन्म की दार्शनिक अवधारणाएं ?

रामपुर

 21-11-2019 11:54 AM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

मानव के जीवन में दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्योंकि हम जिस किसी भी विषय का ज्ञान अर्जित करते हैं उस विषय या ज्ञान की उत्पत्ति दर्शन से हुई है। किसी वस्तु का साक्षात्कार करने या दर्शन करने के बाद ही उसके प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है तथा उस विषय या वस्तु का ज्ञान प्राप्त होता है। दर्शन या दार्शनिक दृष्टिकोण के प्रति यह रुझान बढाने के लिए प्रत्येक वर्ष नवंबर माह के हर तीसरे गुरूवार को विश्व दर्शन दिवस मनाया जाता है और इस वर्ष भी 21 नवंबर के दिन यह दिवस मनाया जा रहा है। दर्शन जीवन के प्रत्येक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करता है जिसके फलस्वरूप यह जीवन समाप्त होने के बाद पुनर्जन्म का अंवेषण भी करता है। पुनर्जन्म एक दार्शनिक या धार्मिक अवधारणा है जो यह कहती है कि मरने के बाद जीव की आत्मा एक अलग भौतिक रूप या शरीर के साथ एक नया जीवन शुरू करती है। यह प्रक्रिया पुनर्जन्म या पारगमन कहलाती है। भारतीय धर्मों जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म और हिंदू धर्म में पुनर्जन्म एक केंद्रीय सिद्धांत है। हालांकि कुछ हिंदू समूह पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते किंतु मृत्यु के बाद भी एक जीवन शैली होती है इस पर विश्वास करते हैं।

पुनर्जन्म की धारणा की उत्पत्ति अस्पष्ट है। इस विषय की चर्चा भारत की दार्शनिक परंपराओं में दिखाई देती है। पुनर्जन्म का विचार प्रारंभिक वैदिक धर्मों में मौजूद नहीं था। इसकी जड़ें वैदिक काल के उपनिषदों में पायी गयी हैं। जन्म और मृत्यु, संस्कार और मुक्ति के चक्र की अवधारणाएं आंशिक रूप से तपस्वी परंपराओं से निकली हैं जो भारत में पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य में उत्पन्न हुई थीं। हालांकि इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन गंगा घाटी या दक्षिण भारत की द्रविड़ परंपराओं को पुनर्जन्म मान्यताओं के एक अन्य प्रारंभिक स्रोत के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
प्रारंभिक वेद, कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत का उल्लेख नहीं करते लेकिन एक ऐसे जीवन का उल्लेख करते हैं जो मृत्यु के बाद भी मौजूद होता है। इसका विस्तृत विवरण पहली बार विभिन्न परंपराओं में पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य दिखाई देते हैं, जिनमें बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिंदू दर्शन के विभिन्न स्कूल शामिल हैं। मृत्यु के बाद जीवन के अस्तित्व के संदर्भ में दो विचार दिए गये है। पहला ये कि आप जीवन को केवल एक ही बार जीते हैं और दूसरा यह कि जीवन बार-बार प्राप्त होता है।

जो लोग यह मानते हैं कि जीवन एक ही बार होता है उन्हें तीन विचारधाराओं में वर्गीकृत किया गया हैं। पहली जीवन के अंत के बाद जीव का कुछ नहीं होता, दूसरी यह की शरीर के अंत के बाद जीव मृत्यु लोक में जाते हैं तथा सदैव वहीं रहते हैं तथा तीसरी यह कि मरने के बाद व्यक्ति या तो स्वर्ग जाता है या फिर नरक। जो लोग पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं यह मानते हैं कि जब तक व्यक्ति जीवन का सबक प्राप्त नहीं कर लेता या जब तक उसकी जिज्ञासाएं या इक्छाएं समाप्त नहीं हो जाती तब तक मनुष्य धरती पर जन्म लेता रहता है। इस अवस्था में कर्म के आधार पर स्वर्ग या नरक की भी प्राप्ति होती है।

प्राचीन मिस्र के लोगों ने पिरामिड का निर्माण किया क्योंकि वे अनंत जीवन काल में विश्वास करते थे। हिन्दू धर्म में अमरता की अवधारणा पर भी विश्वास किया जाता है। हिन्दू धर्म में प्रायः यह माना जाता है कि मरने के बाद जीव या तो दूसरा रूप लेकर फिर धरती पर आता है या दूसरी दुनिया में चला जाता है। इसलिए हिन्दू अनुष्ठानों में पानी और अग्नि के संयोजन का प्रयोग किया जाता है। आग दूसरे संसार में चले जाने जबकि पानी पुनर्जन्म को संदर्भित करती है। भारतीय उपनिषदों के अनुसार जब आत्मा शरीर से विदा होती है तब प्राण-श्वासे शरीर से निकल जाती हैं तथा शरीर के अंग भी क्षीण हो जाते हैं। तब आत्मा विशेष चेतना से संपन्न हो जाती है और उस शरीर में चली जाती है जो उस चेतना से संबंधित है। अत्यंत शुद्ध जीवन जीने वाला तथा ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति देवलोक में जाता है किंतु जो व्यक्ति जीवन रहते पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में असफल रहता है उसे पूर्ण ज्ञान प्राप्ति के लिए ब्रह्मलोक भेजा जाता है और वहां से वह निश्चित रूप से मुक्ति को प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त जो लोग परोपकारी व दान पुण्य करते हैं वे पितृ लोक जाते हैं। तथा वहां सुख भोगकर वापस पृथ्वी पर आ जाते हैं, क्योंकि उनके पास अभी भी सांसारिक इच्छाएं होती हैं। वे लोग जो अशुद्ध जीवन तथा निषिद्ध कार्यों में जीवन बिताते हैं उन्हें मरने के बाद नरक की प्राप्ति होती है। अपने बुरे कार्यों को समाप्त करने के बाद, वे फिर से मानव शरीर में पृथ्वी पर पुनर्जन्म लेते हैं। वे लोग जो अपने विचारों और कार्यों में बेहद उलझे हुए होते हैं वे कीड़े-मकौड़ों के रूप में बार-बार पुनर्जन्म लेते हैं। जब उनके बुरे कार्य समाप्त हो जाते हैं तब वे वापस पृथ्वी पर मानव शरीर में लौट आते हैं। इन सभी में वे लोग जो जीवन रहते ही आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं अंततः ब्रह्म में लीन हो जाते हैं तथा मूल तत्व में मिल जाते हैं।

इस्लामी अवधारणा मनुष्य या भगवान के पुनर्जन्म के किसी भी विचार को अस्वीकार करते हैं। यह जीवन की एक रैखिक अवधारणा को सिखाता है, जिसमें मनुष्य का केवल एक ही जीवन होता है और मृत्यु के बाद उसे भगवान द्वारा आंका जाता है, फिर उसे स्वर्ग में पुरस्कृत किया जाता है या नरक में दंडित किया जाता है। इस्लाम में स्वर्ग को जन्नत तथा नरक को जहन्नुम कहा गया है। मरने के बाद व्यक्ति को कब्र में दफनाया जाता है। इनका मत है कि जो मानव अल्लाह पर पूरी श्रद्धा और विश्वास करता है तथा धार्मिक या नेक कर्म करता है उसे जन्नत की प्राप्ति होती है किंतु जो इस्लाम धर्म या कुरान के विपरीत चलता है उसे जहन्नुम की प्राप्ति होती है। इस्लाम सिखाता है कि मनुष्य की संपूर्ण रचना का उद्देश्य केवल ईश्वर की पूजा करना है तथा दूसरे मनुष्यों और जीवों के जीवन के प्रति दया करना है। इस्लाम सिखाता है कि पृथ्वी पर हम जो जीवन जी रहे हैं, वह प्रत्येक व्यक्ति के अंतिम निवास को निर्धारित करने के लिए एक परीक्षण के अलावा कुछ नहीं है। मृत्यु के बाद जीवन शाश्वत और चिरस्थायी हो जाता है।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Reincarnation
2. https://devdutt.com/articles/what-exactly-happens-after-death-according-to-hinduism/
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Afterlife
4. https://www.ramakrishna.org/activities/message/weekly_message43.htm



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