भारत की शुरुआती टॉकीज़ की अछूत कन्या

रामपुर

 16-09-2018 01:43 PM
द्रिश्य 1 लेंस/तस्वीर उतारना

महान लोग हमेशा वे नहीं होते जो व्यवस्था और तंत्र के विरूद्ध जाते हैं तथा बाकी सबके लिए पथ बनाते हैं, कई बार वे ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने पीछे एक छाप छोड़ जाते हैं जो समय के साथ धुंधली तो हो जाती है पर उसका प्रभाव आम हो जाता है। उन्हीं में से एक थे जर्मनी के फ्रान्ज़ ऑस्टेन। उनके द्वारा किया गया भिन्न संस्कृतियों का जोड़ आज दुनिया भुला चुकी है परन्तु आपको ये भी बता दें कि उनके बिना भारत का सिनेमा जगत वर्तमान स्थिति से बिलकुल अलग हो सकता था।

सही मायने में फ्रान्ज़ हिंदी फिल्मों के खोजकर्ता थे जिन्होंने सन 1940, 1950 और कुछ हद तक 1960 की सबसे बड़ी और मशहूर फ़िल्में निर्मित की थीं। सन 1924 में फ्रान्ज़ एक लन्दन में रहने वाले भारतीय वकील से मिले जिनका नाम था हिमांशु राय। उस समय राय फ्रान्ज़ की जन्मभूमि म्युनिक आये हुए थे। उनके म्युनिक आने का लक्ष्य था विश्व के धर्मों पर आधारित अपनी फिल्मों की एक श्रृंखला के लिए कुछ साथी ढूंढना और वहाँ उन्होंने साथी के रूप में हाथ मिलाया फ्रान्ज़ के भाई पीटर की कंपनी के साथ।

इसके बाद फ्रान्ज़ द्वारा फ़िल्में बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। ऑस्टेन ने शुरुआत की ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ (1925) की शूटिंग से। उस समय इसके जैसी काफी और भी फ़िल्में भिन्न निर्माताओं द्वारा बनाई जा रही थीं पर एक विशेषता जो इस फिल्म को सबसे अलग बनाती थी वह ये थी कि ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ की शूटिंग भारत में हुई थी जिससे फिल्म और भी वास्तविक लगती थी। यह फिल्म यूरोप में काफी प्रसिद्ध हुई तथा इसके बाद ऑस्टेन और राय की जोड़ी ने ऐसी दो और फ़िल्में बनाईं, ‘शिराज़’ (1928) जो ताज महल की कहानी पर आधारित थी और ‘प्रपंच पाश’ (1929) जो महाभारत पर आधारित थी।

सिनेमा में मौन से आवाज़ों के तकनीकी सफ़र की वजह से ऑस्टेन और राय की साझेदारी थम गयी क्योंकि जर्मन बोलते हुए भारतीय फिल्मों में अटपटे लगते। परन्तु ये उनकी साझेदारी का अंत नहीं था। 1934 में बॉम्बे टॉकीज़ की नींव रखने के बाद राय ने फ्रान्ज़ को दोबारा संपर्क किया और इसके बाद इन्होंने काफी फ़िल्में साथ बनाईं जिनमं् से एक थी ‘अछूत कन्या’ (1937) जिसने मशहूर भारतीय अभिनेता अशोक कुमार को प्रसिद्धी की सीढ़ी पर चढ़ाया। यह पूरी फिल्म आप ऊपर दिए गए विडियो में देख सकते हैं।

हालांकि ऑस्टेन को हिंदी का एक शब्द भी समझ नहीं आता था, फिर भी उन्होंने इतनी ख़ास फिल्मों का निर्माण किया जिन्हें आज तक फिल्म जगत की सबसे बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है, इससे समझ आता है कि फ्रान्ज़ को अपनी कला की पूरी पूरी समझ थी तथा शायद वे ना होते तो आज भारतीय सिनेमा जगत इतनी प्रगति न कर पाता।

संदर्भ:
1.https://swarajyamag.com/culture/the-many-ways-cinema-forgot-franz-osten
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Franz_Osten



RECENT POST

  • गोवलिया टैंक मैदन बैठक से 1942 क्रांति की अनदेखी छवियां, जहां गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन का भाषण दिया था
    आधुनिक राज्य: 1947 से अब तक

     15-08-2020 01:42 PM


  • क्या रहा समयसीमा के अनुसार, अब तक प्रारंग और रामपुर का सफर
    शुरुआतः 4 अरब ईसापूर्व से 0.2 करोड ईसापूर्व तक

     14-08-2020 08:00 AM


  • जल की मात्रा पर आधारित है, जल घडी
    सिद्धान्त I-अवधारणा माप उपकरण (कागज/घड़ी)

     14-08-2020 06:34 PM


  • जंगल की आग:अनूठे पलाश
    बागवानी के पौधे (बागान)

     13-08-2020 07:40 PM


  • रामपुर में मेंथा की खेती
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     12-08-2020 06:29 PM


  • जन्माष्टमी के कई उत्सव
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     11-08-2020 09:42 AM


  • जलवायु परिवर्तन के नैतिक सिद्धांत
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     10-08-2020 06:36 PM


  • धरती का सबसे बारिश वाला स्थान
    जलवायु व ऋतु

     09-08-2020 03:46 AM


  • विभिन्न देशों में लोकप्रियता हासिल कर रही है कबूतर दौड़
    पंछीयाँ

     08-08-2020 06:54 PM


  • बौद्धिक विकास के लिए अत्यधिक लाभकारी है सुरबग्घी
    हथियार व खिलौने

     06-08-2020 06:14 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id