मुद्रण (Printing) की भिन्न तकनीकें

रामपुर

 04-05-2018 02:40 PM
वास्तुकला 2 कार्यालय व कार्यप्रणाली

आज रामपुर रज़ा लाइब्रेरी में भारत की बहुत सी पुरानी क़िताबें और हस्तलिखित सामग्री का संग्रह है, इसी कारण भारत सरकार इस पुस्तकालय को वित्त प्रदान करती है। इनमें से कई क़िताबें अनमोल हैं क्यूंकि वे सचित्र हैं जो उर्दू, फारसी, पश्तो, अंग्रेजी और देवनागरी में लिखी गयी हैं। क्या आपको हस्तलिखित और मुद्रित किताब में अंतर पता है? क्या आप सचित्र मुद्रण के विभिन्न प्रकार से वाकिफ हैं?

हस्तलिखित का अर्थ उसके नाम से ही पता चल जाता है, जो किताब हाथों से लिखी गयी हो अथवा हाथों से प्रतिलिपित की गयी हो। सन 1450 के बाद मुद्रण यंत्र के आविष्कार के बाद हस्तलिखित का अर्थ थोड़ा प्रतिबंधित हो गया जिसके अंतर्गत किताब मुद्रित करने के लिए अक्षर प्रकार किसी निश्चित दायरे में नहीं था। टंकित्र यानि टाइपराइटर (Typewriter) के आने के बाद हस्तलिखितों को तीन भागों में बांटा गया जिसमें पहले लेखक खुद हाथ से लिखता है, फिर वो वापस अपने हाथ से उसकी ठीक-ठाक प्रतिलिपि बनाता है और आखिर में टंक-लेखक उसे टंकित करता है वो। आज के काल में भी लेखक हस्तलिखित काम करते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि कलम की बजाय अब वे कंप्यूटर के कीबोर्ड का इस्तेमाल करते हैं। मुद्रित क़िताबें मुद्रण के विविध प्रकारों का इस्तेमाल कर बनाई हुई होती हैं।

सचित्र मुद्रण कला मोटे तौर पर 4 से 5 प्रकार की होती है:
- उत्कीर्णन नक्काशी बनाना
- निक्षारण नक्काशी बनाना
- एक्वाटिंट मतलब एक तरीके की कलमकारी का इस्तेमाल
- डेस्कटॉप (Desktop) प्रकाशन
- सतह पर प्रक्रिया कराके नक्काशी बनाना

1. उत्कीर्णन नक्काशी बनाना: इस प्रक्रिया में जस्त या ताम्र की बारीकी से चमकाई हुई पट्टी पर प्रतिमा चित्रित होती है। खोदनी अथवा छेनी का इस्तेमाल कर इस पट्टी पर रेखांकन किया जाता है। जो धातु काटा जाता है उसे उपकरण के सामने फेंका जाता है और खांचे के दोनों तरफ एक छोटा सा उठाव लाया जाता है, क्यूंकि मुद्रण में स्पष्ट रेखाएं अपेक्षित होती हैं इस उठाव को खुरचनी का इस्तेमाल कर काट दिया जाता है। खुरचानी का इस्तेमाल भूलों को सुधरने के लिए भी किया जाता है। खांचे के निचली सतह के धातु को काट दिया जाता है और उसकी वजह से जो गड्ढा बन जाता है उसे पट्टी के पीछे से ठोक कर निकाल दिया जाता है। झलाई का इस्तेमाल उथली रेखाओं को धातु के साथ रगड़ कर निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

2. निक्षारण नक्काशी बनाना: धातु की पट्टी को मोम, गोंद, राल के अम्ल-प्रतिरोधी गरम मिश्रण से आच्छादित किया जाता है। ठन्डे होने पर यह आच्छादन पारदर्शक हो जाता है। फिर इस पत्ती को आंच पर पकड़ के पूरी तरह से काला किया जाता है जिसकी वजह से कलाकार उसके बनाए हुए चित्र को देख सकता है, यह चित्र छेनी का इस्तेमाल कर बनाया जाता है जिसमें जहाँ रेखाओं की जरुरत होती है वहाँ पर धातु-पट्टी की सतह को खोला जाता है। धातु के बाहरी हिस्से और पिछली सतह को रोगन से सुरक्षित किया जाता है और फिर मंद अम्ल जैसे शोरे से बने अथवा हाइड्रोक्लोरिक (Hydrochloric) अम्ल में डुबोया जाता है, उसी तरह पट्टी के किनारों को मोम से किनारा बनाकर बंद कर दिया जाता है जिसके अन्दर फिर अम्ल डाला जाता है। इस प्रक्रिया को अंग्रेजी में ‘बाईटिंग’ (Biting) कहते हैं। जब सबसे हल्की रेखाओं का निक्षारण होता है तब पत्ती को निकाल के इसपर रोगन लगाया जाता है, ऐसे काटने की प्रक्रिया बहुत बार होती है ताकि रेखाओं की गहराई और चौड़ाई पर नियंत्रण रह सके। निक्षारण उत्कीर्णन से ज्यादा सरल होता है क्यूंकि इसकी सतह पर नक्काशी बनाना उत्कीर्ण सतह से ज्यादा आसान होता है।

3. एक्वाटिंट मतलब एक तरीके की कलमकारी का इस्तेमाल: इस प्रक्रिया का आविष्कार जीन-बोअटिस्ट लेप्रिन्स ने 18वी शती के मध्य में किया था। इसमें डामर के चूरे और रोगन को पट्टी पर झाड़ कर अथवा सुरासार में मिश्रित करके लगाया जाता है। चूरे को पट्टी पर पक्का लगाया जाता है ताकि उसकी सतह झर्झारी हो कर उसमें से अम्ल अंदर जाकर रेखाओं का जाल बना सके। इसमें कलाकार अपने मनचाहे तरीके से रंग की गहराई चाहे जैसी ऊपर नीचे कर सकता है, यह तब तक चलता है जब तक उसे मनचाहे रंग ना मिल जाए।

4. डेस्कटॉप (Desktop) प्रकाशन: डेस्कटॉप प्रकाशन की शुरुवात के बारे में दो राय हैं, कुछ लोगों के हिसाब से इसकी शुरुवात और विकास ज़ेरॉक्स पी.ए.आर.सी. (Xerox PARC) में सन 1970 में हुई थी तथा कुछ लोगों के हिसाब से जेम्स डेविस द्वारा विकसित किये संगणकीय कार्यप्रणाली से इसकी शुरुवात हुई। डेस्कटॉप प्रकाशन में दस्तावेजों का निर्माण कर उन्हें छापने के लिए कंप्यूटर के इस्तेमाल से पन्नों के खाके बनाए जाते हैं। इस प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर (Software) द्वारा विभिन्न प्रकार के खाके तथा मुद्रित लिखावट और चित्रों का निर्माण किया जाता है जिनकी गुणवत्ता बिलकुल परंपरागत छपाई जैसे होती है। इस तकनीक को इस्तेमाल कर व्यक्ति, व्यावसायिक और छपाई की अन्य मनचाही विस्तृत शृंखला स्वयं प्रकाशित कर सकता है। इसमें कोई भी व्यावसायिक खर्च के बिना कम क़ीमत में मेनू, पुस्तिका, बड़ी क़िताबें आदि का निर्माण और छपाई कर सकते हैं।

5. सतह पर प्रक्रियां कराके नक्काशी बनाना: इस प्रक्रिया में चित्र और पृष्ठभूमि समतल होते हैं। शिलामुद्रण इस प्रकिया का प्रमुख प्रकार है। शिलामुद्रण की शुरुवात अलोइस सेनफेल्डर ने सन 1798 में की थी। उससे यह पता चला कि किसी विशिष्ट प्रकार की रंगत जब तेलिया पदार्थ जैसे ओंगन अथवा रोगन पर आहात की जाती है तब उसे छपाई में इस्तेमाल किया जा सकता है। छपाई की स्याही तालमय पदार्थ खीच लेता है लेकिन पत्थर की बिना चिकनाहट वाली जगह उसे विकर्षित करती हैं। इस छपाई तंत्र के लिए सबसे उत्तम चूने का पत्थर होता है क्यूंकि वह ओंगन और पानी को समान रूप से सोख लेता है। पत्थर पर शिलामुद्रण की स्याही का इस्तेमाल करके चित्र बनाया जाता है जो साबुनी मेद से बने होते हैं जो तेल-चित्र को पत्थर की सतह पर सोख कर पानी और कालिख को विकर्षित करते हैं, मोम, मेद आदि का इस्तेमाल इसकी कठोरता को नियंत्रित रखने के लिए किया जाता है। छपाई से पहले जिन पर चित्र ना बना हो ऐसी सतहों पर प्रक्रिया की जाती है ताकि उनपर तेल का परिणाम ना हो। यह प्रक्रिया कुछ इस प्रकार की होती है: इसपर राल और फ्रेंच चाक (French Chalk) छिड़की जाती है जिसके बाद पत्थर पर अरबी गोंद, एच (Etch) नामक थोड़ा सा शोरे के अम्ल का मिश्रण स्पंज से लगाया जाता है, इस अम्ल से पत्थर के छिद्र खुल जाते हैं और वे अरबी गम को सोख लेते हैं। एक बार यह मिश्रण सूख जाए तो ज्यादा गोंद धो दी जाती है और स्याही को तारपीन के तेल और खनिज़ तारपीन से साफ़ किया जाता है। इस पत्थर को फिर नम किया जाता है जिस वजह से चित्र नम पृष्टभूमि पर उभरकर आता है। फिर उस पर छपाई की स्याही बेलन जैसे उपकरण से पूरी सतह पर एक सी लगाई जाती है। छपाई के लिए पत्थर को चलत सतह पर रखा जाता है और छपाई के कागज़ को उसके ऊपर रखा जाता है, इस कगाज़ को बहुत से काग़ज़, पत्रक आदि से सुरक्षित किया जाता है और फिर उन्हें पीतल अथवा जस्त से बने झिल्ली के परदे से ढका जाता है। चमड़े के आवरण वाली खुर्चनी से फिर छपाई की जगहों पर दबाव डाला जाता है तथा जब तक वे झिल्ली की सतह पर ना पहुंचे उनकी ऊंचाई को ठीक किया जाता है। रंगाई का काम इस पूरी सतह को मुद्रण यंत्र से घुमाकर पूरा किया जाता है। शिलामुद्रण में जस्त और एल्युमीनियम (Aluminium) धातु की पट्टियों का भी इस्तेमाल होता है।

1. http://csmt.uchicago.edu/glossary2004/manuscript.htm
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Desktop_publishing
3. व्यूज ऑफ़ इंडिया, 12-14, सन 2000



RECENT POST

  • जलीय पारितंत्र को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, शार्क
    व्यवहारिक

     15-05-2022 03:26 PM


  • क्या भविष्य की पीढ़ी के लिए एक लुप्त प्रजाति बनकर रह जाएंगे टिमटिमाते जुगनू?
    तितलियाँ व कीड़े

     14-05-2022 10:07 AM


  • गर्मियों में रामपुर की कोसी नदी में तैरने से पूर्व बरती जानी चाहिए, सावधानियां
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     13-05-2022 09:35 AM


  • भारत में ऊर्जा खपत पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए नीति और संरचना में बदलाव
    जलवायु व ऋतु

     11-05-2022 09:05 PM


  • रामपुर के निकट कासगंज से जुड़ा द सेकेंड लांसर्स रेजिमेंट के गठनकर्ता विलियम गार्डन का इतिहास
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     11-05-2022 12:08 PM


  • कोविड 19 के उपचार हेतु लगाए जाने वाले एमआरएनए टीकों से उत्‍पन्‍न समस्‍या
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     10-05-2022 08:57 AM


  • भारत में दुनिया में सबसे अधिक एम.बी.ए डिग्री प्राप्तकर्ता हैं, लेकिन फिर भी कई हैं बेरोजगार
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     09-05-2022 08:51 AM


  • निवख समूह के लिए उनके पूर्वज और देवताओं दोनों को अभिव्यक्त करते हैं, भालू
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     08-05-2022 07:31 AM


  • रबिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन की तर्ज पर समझिये आदर्श शिक्षा की परिभाषा
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     07-05-2022 10:48 AM


  • रामपुर में पक्षी विहार की योजना बढ़ा देगी सौन्‍दर्य, मानव तथा पर्यावरण का स्वास्थ्य
    पंछीयाँ

     06-05-2022 09:14 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id