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संध्या वंदना का महत्त्व

रामपुर

 17-04-2018 01:10 PM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

वर्तमान के शहरी माहौल में संध्या पूजा इतने महत्वपूर्ण तरीके से दिखाई तो नहीं देती पर, हाँ, विभिन्न मंदिरों और नदियों के किनारे बसे पवित्र शहरों में ये जरूर दिखाई दे जाती हैं। जैसा कि गंगा किनारे बसे बनारस, हरिद्वार आदि स्थानों से इस पूजा की अनुपम झलकी मिल जाती है। संध्या वंदना सनातनी समाज में एक महत्त्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। प्रत्येक सनातनी परिवार में संध्या वंदना की ही जाती है। सनातनी दैनिक पूजा व संध्या वंदना को समझने के लिए हमें विभिन्न दैनिक पूजा के नामों और उनके महत्वों की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। इन पूजा में हाथों की स्थिति और उनका कार्य करने का तरीका भी महत्वपूर्ण होता है तथा उसका भी अपना एक महत्व होता है।

सनातनी समाज में दैनिक पूजा की शुरुआत प्रातः काल की पूजा से होती है। यह पूजा अपने गुरु को समर्पित होती है जहाँ पर सूर्य की प्रथम किरण के सामने जल अर्पण कर एक चटाई पर बैठ कर वंदना पूजा की जाती है। इस पूजा के दौरान निम्नलिखित श्लोक का वाचन किया जाता है-

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगं।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथं॥

ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदं शिवविरिंचिनुतं शरण्यं।
भृत्यार्तिहं प्रणतपालं भवाब्धिपोतं वंदे महापुरुष ते चरणारविंदं॥

उपरोक्त दिए गए श्लोक में पूजा करने वाला गुरु की वंदना करता है और ईश्वर की महिमा का बखान भी करता है। इस पूजा के साथ पूजा करने वाला अपने शरीर को आध्यात्म रूप से शुद्ध करता है। इसी प्रकार से दिन भर की पूजा के बाद संध्या का समय आता है जब वह संध्या की पूजा करता है। इस पूजा में दीप अर्पण किया जाता है तथा ईश्वर को उनके द्वारा प्रदत्त वस्तुओं आदि के लिए शुक्रिया किया जाता है। सायंकाल की पूजा का अपना एक महत्व होता है तथा प्रातः की पूजा की विधि से सायं की पूजा की विधि में कई अंतर भी पाए जाते हैं।

इन पूजाओं को करने के लिए प्रमुख रूप से हाथ की 16 मुद्राएँ निश्चित की गयी हैं जिनका अपना एक अलग महत्व है। ये मुद्राएँ निम्नलिखित हैं-
सक्तं, जुम्मपस, सन्मुख, खूर्मुखम, अधमुखं, एक मुखं, ब्यापुख़म, अंजुली, पुर्लुम्ब आदि।

उपरोक्त दिए गए आसनों के आधार पर ही पूजा की जाती है जैसे अंजुली जल अर्पण के लिए। इस्लाम में भी नमाज का इसी प्रकार से सूर्य के आधार पर ही विभाजन किया गया है। सिखों में भी पूजा का यही विधान है, ये समस्त तथ्य हिन्दू (सनातनी) इस्लाम, सिख आदि धर्मों की समानता को प्रदर्शित करते हैं।

1. https://en.wikisource.org/wiki/The_Sundhya,_or,_the_Daily_Prayers_of_the_Brahmins
2. https://en.wikisource.org/wiki/The_Sundhya,_or,_the_Daily_Prayers_of_the_Brahmins/Plate_1
3. https://en.wikisource.org/wiki/The_Sundhya,_or,_the_Daily_Prayers_of_the_Brahmins/Plate_2



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