Machine Translator

लौहे का इतिहास

रामपुर

 25-02-2019 12:16 PM
खनिज

लौह युग उस काल को कहा गया है, जिसमें मनुष्य ने लोहे का उपयोग किया। इतिहास में यह युग 'पाषाण युग' तथा 'कांस्य युग' के बाद का काल है। लौहा सिर्फ कार, पुल या अन्य चीजों में ही इस्तेमाल नहीं किया जाता है, ये हमारे अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है। ये हमारे हीमोग्लोबिन का एक महत्वपूर्ण घटक है जो रक्त को लाल रंग प्रदान करता है। सिर्फ हमें ही नहीं इसकी जरूरत पौधों को भी होती है। 18वीं शताब्दी की शुरुआत में फ्रांसीसी रसायनज्ञ और चिकित्सक निकोलस लेमरी ने जली हुई घास की राख में लोहे की खोज की। बाद में यह पाया गया कि यह तत्व सभी पौधों की संरचना का महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि यह क्लोरोफिल के गठन के लिए आवश्यक है और ये श्वसन एंजाइमों (anzyms) में मौजूद होता है तथा पौधों की श्वसन दर पर काफी प्रभाव डालता है।

सदियों और सहस्राब्दी से मनुष्य, लोहे का उपायोग करते आ रहे है। प्राचीन काल में तो लोग सोने से अधिक लोहे का भण्डार करते थे। उस समय में केवल सबसे कुलीन वर्ग ही लोहे से बनी चीजें पहन सकते थे जो अक्सर सोने में गुटे हुए होते थे। प्राचीन रोम में भी शादी के छल्ले लोहे के बने होते थे। समय के साथ, जैसे जैसे धातु विज्ञान विकसित हुआ, लोहा सस्ता और अधिक उपलब्ध होता गया। माना जाता है कि लौहे के रूप में मनुष्य ने जिस धातु का उपयोग किया था वो पृथ्वी से उत्पन्न लौहा नहीं था दरअसल वो पृथ्वी से टकराने वाले उल्कापिंडों से प्राप्त लोहा था। उल्कापिंड संबंधी लोहे से काम करना तुलनात्मक रूप से आसान था, और लोगों ने इससे आदिम उपकरण बनाना सीखा।

पहले के समय में 90% लोहे से युक्त हजारों टन उल्का पदार्थ हर साल पृथ्वी की सतह से टकराते थे। सबसे भारी लोहे के उल्कापिंड में से एक "होबा" उल्कापिंड है जो प्राचीन काल में गिर गया था, इसका वजन लगभग 60 टन था। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिकियों ने उल्कापिंड में सबसे अधिक रुचि दिखाई, क्योंकि एक ऐसी अफवाहें फैली हुई थीं कि उल्का पिंडों में प्लैटिनम भी पाया जाता है। यहां तक की उस समय उल्का के औद्योगिक दोहन को व्यवस्थित करने के लिए एक शेयरधारक कंपनी की भी स्थापना की गई थी। परंतु उल्कापिंड से लाभान्वित होना मुश्किल साबित हुआ क्योंकि उल्कापिंड की कठोरता के कारण हीरे की ड्रिल टूट गई और इसके नमूनों में प्लैटिनम भी नहीं पाया गया।

समय के साथ साथ लोहे की जरूरत बढ़ रही थी और उल्कापिंड हमेशा तो गिरते नहीं थे जिससे की लोहे की कमी को पूरा किया जा सके। इसी कमी को पूरा करने के लिये लौहे को अयस्कों से निकालने का प्रयास किया गया और आखिरकार वह समय आ गया जब कांस्य युग ने लौह युग को जन्म दिया। लौहा पृथ्वी पर सबसे व्यापक रूप से वितरित तत्वों में से एक है, यह पृथ्वी की भू-पर्पटी में लगभग 5% या 755,000,000,000,000,000 टन हैं। मुख्य लौह अयस्क खनिज मैग्नेटाइट, लौह स्टोन, भूरा हेमाटाइट और सिडेराईट हैं। मैग्नेटाइट में 72% तक लोहा होता है। लाल हेमाटाइट में लगभग 70% लोहा होता है और इसका नाम ग्रीक "हेमा" से लिया गया है जिसका अर्थ "रक्त" है। शुरूआत में अयस्क से लौह निकालने की तकनीक ज्यादा विकसित नहीं थी परंतु वक्त के साथ इसमें कई सुधार होते गये। धीरे- धीरे लौहे की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बढ़ने लगी और उस समय यूराल का लोहा बहुत मूल्यवान था।

समय के साथ लोहे की मांग को पूरा करने के लिये कई अयस्क भंडारों की खोज की गई। 19वीं शताब्दी के अंत तक प्रौद्योगिकी में लोहे का उपयोग अत्याधिक देखा गया, 1778 में पहला लोहे का पुल बनाया गया था, 1788 में पहली लोहे की पाइप लाइनें बिछाई गईं, 1818 में पहला लोहे का जहाज लॉन्च किया गया था, और पहला लौहे का रेलमार्ग 1825 में ब्रिटैन में चालू किया गया था। इस प्रकार ना जाने कितने उपकरण तैयार किये गये थे। परंतु बाद में देखा गया की लोहे पर जंग लगने से लोहा खराब होने लगा है। कई टन लौहा जंग की वजह से खराब भी हो गया था। तब शोधकर्ता इससे बचने के उपाय खोजने गये और इस बारे में भी जानने की कोशिश की प्राचीन काल में जंग की समस्या से कैसे लोग बचते थे।

लोहे के लेखों पर जंग लगने से बचाने के लिए टिन की कोटिंग का उल्लेख यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के कार्यों में मिलता है। भारत में भी जंग का मुकाबला करने के 1600 वर्षों से कई उपाय अपनाये जाते आ रहे है। शुरुआती दिनों में भी भारतीय कारीगरों को पता था कि जंग से कैसे निपटना है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है भारत की राजधानी में गुप्त वंश के राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा बनवाया गया एक लौह स्तम्भ जो 1600 वर्ष से अधिक पुराना है, ये जंगरोधी स्तम्भ है इस पर आज तक जंग नहीं लगी है।

यदि भारत में लौह युग की बात की जाये तो भारतीय उपमहाद्वीप की प्रागितिहास में, लौह युग की शुरूआत अंतिम हड़प्पा संस्कृति के काल से हुई थी। वर्तमान में यहां उत्तरी भारत के मुख्य लौह युग की पुरातात्विक संस्कृतियां: गेरूए रंग के बर्तनों की संस्कृति (1200 से 600 ईसा पूर्व) और उत्तरी काले रंग के तराशे बर्तन की संस्कृति (700 से 200 ईसा पूर्व) में देखी जा सकती हैं। लोहे के गलाने का सबसे पहला प्रमाण कई सदियों से लौह युग के उद्भव को दर्शाता है। पुराने समय में भारत दुनिया भर में अपने स्टील के सामान के लिए प्रसिद्ध था। रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर उत्तर भारत में लोहे का प्रारम्भ 1800 और 1000 ईसा पूर्व तथा दक्षिण भारत में 1000 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Iron_Age_in_India



RECENT POST

  • रामपुर में स्थित है भारत का पहला लेज़र नक्षत्र-भवन
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     22-08-2019 02:23 PM


  • दु:खद अवस्था में है, रामपुर की सौलत पब्लिक लाइब्रेरी
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     21-08-2019 03:40 PM


  • क्यों कहा जाता है बेल पत्थर को बिल्व
    पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

     20-08-2019 01:37 PM


  • देश में साल दर साल बढ़ती स्‍वास्‍थ्‍य चिकित्सा लागत
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     19-08-2019 02:00 PM


  • क्या होता है, सकल घरेलू उत्पाद (GDP)
    सिद्धान्त I-अवधारणा माप उपकरण (कागज/घड़ी)

     18-08-2019 10:30 AM


  • कैसे पड़ा हिन्‍द महासागर का नाम भारत के नाम पर?
    समुद्र

     17-08-2019 01:54 PM


  • रामपुर नवाब के उत्तराधिकारी चुनाव का संघर्ष चला 47 साल तक
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     16-08-2019 05:47 PM


  • अगस्त 1942 को गोवालिया टैंक मैदान में ध्वजारोहण के बाद की अनदेखी छवियाँ
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     15-08-2019 08:16 AM


  • सहयोग व रक्षा का प्रतीक हैं पर्यावरण अनुकूलित हस्तनिर्मित राखियां
    द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

     14-08-2019 02:41 PM


  • रामपुर पर आधारित भावनात्मक इतिहास लेखन
    सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

     13-08-2019 12:44 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.